Sufinama

ख़ुदा पर अशआर

क़नाअत दूसरे के आसरे का नाम है 'मुज़्तर'

ख़ुदा है जो कोई हद्द-ए-तवक्कुल से निकल आया

मुज़्तर ख़ैराबादी

उन बुतों के लिए ख़ुदा करे

दीन-ओ-दिल यूँ कोई भी खोता है

ख़्वाजा मीर असर

'हैरत' कि तुझ को हैरत-ए-दीदार हो नसीब

देख ले तू शान-ए-ख़ुदा हुस्न-ए-यार में

हैरत शाह वारसी

तू निगह की की ख़ुदा जाने

हम तो डर से कभो निगाह की

ख़्वाजा मीर असर

तलब-ए-राह-ए-ख़ुदा में लेकिन

पैरवी हैदर-ए-कर्रार की है

आसी गाज़ीपुरी

ख़ुद्दारी-ओ-महरूमी महरूमी-ओ-ख़ुद्दारी

अब दिल को ख़ुदा रखे अब दिल का ज़माना है

जिगर मुरादाबादी

हमें तो जीते जी कौसर को पिलवा

ख़ुदा-या छोड़ दी है तेरे डर से

रियाज़ ख़ैराबादी

लिखी क्या ना'त है अल्लाहु-अकबर

ख़ुदा-ए-पाक महशर में जज़ा दे

अकबर वारसी मेरठी

देखा जो उस सनम को तो महसूस ये हुआ

जल्वा ख़ुदा का सूरत-ए-इंसान हो गया

फ़ना बुलंदशहरी

ख़याल-ए-ख़ुदा में ख़ुदी को भुला कर

निशान-ए-ख़ुदा हम जमाए हुए हैं

शम्स साबरी

तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो

बुतो क्या किसी के ख़ुदा हो

बेदम शाह वारसी

ख़ुदा जाने था ख़्वाब में क्या समाँ

अरे दर्द-ए-दिल क्यूँ जगाया मुझे

बेनज़ीर शाह वारसी

ये आ’लम है ‘रियाज़’ एक एक क़तरा को तरसता हूँ

हरम में अब ख़ुदा जाने भरी बोतल कहाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

तमाम हों अभी झगड़े ये लन-तरानी के

दिखा दो जल्वा ख़ुदा-रा अगर कलाम के बा'द

आसी गाज़ीपुरी

वही ज़ात-ए-मुतलक़ वही बे-नज़ीर

वही शक्ल-ए-इंसाँ ख़ुदा है वही

बेनज़ीर शाह वारसी

आप मा'शूक़ क्या हो गए

आ’शिक़ों के ख़ुदा हो गए

पुरनम इलाहाबादी

ख़ुदा-या ख़ैर करना नब्ज़ बीमार-ए-मोहब्बत की

कई दिन से बहुत बरहम मिज़ाज-ए-ना-तवानी है

जिगर मुरादाबादी

है लुत्फ़ ज़िंदगी का ब'अद-अज़-फ़ना उसी में

नाम-ए-ख़ुदा जो अपने सब तन-बदन से निकले

मरदान सफ़ी

टुक समझ कर तो लगाओ लात हाँ बहर-ए-ख़ुदा

ये कुनिश्त दिल है देखो बुताँ बहर-ए-ख़ुदा

शाह नसीर

पुश्त-ए-पा मारें क्यों हिम्मत-ए-गर्दूं पर ‘रिंद’

शल नहीं फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से अभी बाज़ू अपना

रिंद लखनवी

ख़ुदा जाने वो जा रहे थे कहाँ

इधर भी निगाह-ए-करम हो गई

बेनज़ीर शाह वारसी

फ़क़ीर-ए-‘कादरी’ जो देखते हैं चश्म-ए-बीना से

तो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत ही जाती है

फ़क़ीर क़ादरी

काम कुछ तेरे भी होते तेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़

हाँ मगर मेरे ख़ुदा तेरा ख़ुदा कोई नहीं

पुरनम इलाहाबादी

इ’श्क़ की इब्तिदा भी तुम हुस्न की इंतिहा भी तुम

रहने दो राज़ खुल गया बंदे भी तुम ख़ुदा भी तुम

बेदम शाह वारसी

जब ख़ुदा से लो लगाई जाएगी

फिर दु’आ कब कोई ख़ाली जाएगी

संजर ग़ाज़ीपुरी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

हाँ बता दे जबीन-ए-शौक़ क्या समझा था मैं

बह्ज़ाद लखनवी

मर्दान-ए-ख़ुदा जो हैं वो हैं आरिफ़ बिल्लाह

तफ़रीक़ नहीं में है कि कुछ पीर-ओ-जवाँ में

अता काकवी

ख़ुदा जाने मिरी मिट्टी ठिकाने कब लगे 'मुज़्तर'

बहुत दिन से जनाज़ा कूचा-ए-क़ातिल में रक्खा है

मुज़्तर ख़ैराबादी

कोई है मोमिन कोई है तरसा ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने

अजब तरह का है ये तमाशः ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने

अज़ीज़ सफ़ीपुरी

लोग कहते हैं मोहब्बत में ख़ुदा मिलता है

लेकिन अपनी है ये हालत कि ख़ुदा याद नहीं

वली वारिसी

बज़्म-ए-ख़ल्वत में वो सोते हैं दुपट्टा ताने

जल्वा-ए-हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद है अंदर-बाहर

कौसर ख़ैराबादी

तुम मिरे रोने पे हंसते हो ख़ुदा हँसता रखे

ये भी क्या कम है कि रो कर तो हंसा सकता हूँ मैं

कामिल शत्तारी

ख़ुदा भी उसी की तरफ़ होगा बे-शक

क़यामत में क्या होगा जाने से हासिल

मिरर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन

किसी बुत की अदा ने मार डाला

बहाने से ख़ुदा ने मार डाला

मुज़्तर ख़ैराबादी

किसी को तो ज़ाहिद को होती मोहब्बत

बुतों की होती ख़ुदा की तो होती

बेनज़ीर शाह वारसी

मोहब्बत बुत-कदे में चल के उस का फ़ैसला कर दे

ख़ुदा मेरा ख़ुदा है या ये मूरत है ख़ुदा मेरी

मुज़्तर ख़ैराबादी

तिरे हाथ मेरी फ़ना बक़ा तिरे हाथ मेरी सज़ा जज़ा

मुझे नाज़ है कि तिरे सिवा कोई और मेरा ख़ुदा नहीं

कामिल शत्तारी

ख़ुदा जाने कहता हूँ मस्ती में क्या

ख़ुदा जाने बकता हूँ क्या जोश में

रियाज़ ख़ैराबादी

ख़ुदा जाने मिरी मिट्टी ठिकाने कब लगे 'मुज़्तर'

बहुत दिन से जनाज़ा कूचा-ए-क़ातिल में रक्खा है

मुज़्तर ख़ैराबादी

लेकिन उस को असर ख़ुदा जाने

हुआ होगा या हुआ होगा

ख़्वाजा मीर दर्द

टुक समझ कर तो लगाओ लात हाँ बहर-ए-ख़ुदा

ये कुनिश्त दिल है देखो बुताँ बहर-ए-ख़ुदा

शाह नसीर

ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम हो

मैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो

राज़ नियाज़

चलो आओ 'काविश' कि कांधा लगाएँ

अली की ख़ुदा ने उठाई है डोली

अब्दुल हादी काविश

सरसब्ज़ गुल की रखे ख़ुदा हर रविश बहार

बाग़बाँ नसीब हो तुझ को बला-ए-गुल

ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़

दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद

तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे

हसरत मोहानी

फँसूँ मैं बुतों के दाम में यूँ

'दर्द' ये भी ख़ुदा की क़ुदरत है

ख़्वाजा मीर दर्द

अ’ली तो-को जानूँ ख़ुदा तो-को जानूँ

मैं रखती हूँ जग से तबीअ'त नियारी

अब्दुल हादी काविश

हश्र के दिन इम्तिहाँ पेश-ए-ख़ुदा दोनों का है

लुत्फ़ है उनकी जफ़ा मेरी वफ़ा से कम रहे

मिरर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन

'अत्तार'-ए-मन ख़ुदा का नकारा बजाया ख़ूब

आरिफ़ ऐसे सुख़न में है बे-इख़्तियार महज़

क़ादिर बख़्श बेदिल

फ़रिश्ते क्यूँ सताते हैं लहद में

ख़ुदा मालिक है जो चाहे सज़ा दे

मुज़्तर ख़ैराबादी

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