बहादुर शाह ज़फ़र के अशआर
मेरी आँख बंद थी जब तलक वो नज़र में नूर-ए-जमाल था
खुली आँख तो ना ख़बर रही कि वो ख़्वाब था कि ख़्याल था
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‘ज़फ़र’ उस से छुट के जो जस्त की तो ये जाना हम ने कि वाक़ई
फ़क़त एक क़ैद ख़ुदी की थी ना क़फ़स था कोई ना जाल था
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere