दर्द काकोरवी के अशआर
‘दर्द’ के दिल को बना मख़्ज़न-ए-फ़व्वारा-ए-नूर
मेरी तारीकी-ए-क़िस्मत के उजाले साक़ी
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अपना बे-ख़ुद मुझे लिल्लाह बना ले साक़ी
बुर्क़ा’ फिर चेहरा-ए-अनवर से हटा ले साक़ी
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere