Sufinama
Hafiz's Photo'

हाफ़िज़

1325/26 - 1389/90 | शिराज, ईरान

मूल नाम : शम्सुद्दीन मुबारक हाफिज़

निधन : शिराज, अन्य, ईरान

असल नाम शम्सुद्दीन मुहम्मद बिन बहाउद्दीन . इन्हें लोग लिसानुल ग़ैब (अदृश्य की ज़बान ) और तर्जुमानुल असरार (रहस्य के अनुवादक ) भी कहा करते थे.  लेवी के अनुसार भाषा, भाव और कल्पना के आधार पर फ़ारसी कवियों में इनका स्थान सर्वोच्च है. जीवन  काल में ही फैली प्रसद्धि के कारण कई देशों के शहंशाहों ने उन्हें अपने यहाँ के लिए आमंत्रण भी भेजे.   मुहम्मद शाह बहमनी के दक्षिण भारत में बुलावे पर हाफ़िज़ ने जाने की तैयारी भी कर ली थी परन्तु जहाज पर चढ़ने से पहले ही कुछ ऐसी दुर्घटना घटी कि उन्हें रुकना पड़ा.  तैमूर और हाफ़िज़  का क़िस्सा भी बेहद प्रसिद्ध है. हाफ़िज़ का यह शेर सुनकर तैमूर लंग ने हाफ़िज़ को तलब किया -

अगर आं तुर्क-ए-शीराज़ी  बदस्त आरद दिल-ए-मा रा

बख़ाल-ए-हिन्दूवश बख़्शम समरक़ंद-ओ-बुखारा रा

तैमूर ने हाफ़िज़ से पूछा कि जिन मुल्कों को जीतने में मुझे इतना ख़ून बहाना पड़ा, उनके बारे में तुम ऐसी बातें क्यों करते हो ?

हाफ़िज़ का उत्तर था - ऐ बादशाह! अपने इन्ही उच्च-विचारों के कारण मैं आजकल इतना कंगाल हूँ. |

रचनायें - दीवान ए हाफ़िज़.