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Sufinama
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हामिद वारसी गुजराती

हामिद वारसी गुजराती के अशआर

आँख उन की फिर आलूदा-ए-नम देख रहा हूँ

ख़ुद पर उन्हें माइल-ब-करम देख रहा हूँ

बाद-ए-रहमत मदीना से चलती रहे

ग़ुंचा-ए-आर्ज़ू मुस्कुराता रहे

उ’म्र गुज़रे इसी कश्मकश में मिरी

ग़म सताता रहे ख़ूँ रुलाता रहे

'हामिद' रहे आबाद सदा शहर-ए-नबी का

जन्नत से भी मर्ग़ूब मदीने की फ़ज़ा है

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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