हामिद वारसी गुजराती के अशआर
आँख उन की फिर आलूदा-ए-नम देख रहा हूँ
ख़ुद पर उन्हें माइल-ब-करम देख रहा हूँ
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बाद-ए-रहमत मदीना से चलती रहे
ग़ुंचा-ए-आर्ज़ू मुस्कुराता रहे
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उ’म्र गुज़रे इसी कश्मकश में मिरी
ग़म सताता रहे ख़ूँ रुलाता रहे
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'हामिद' रहे आबाद सदा शहर-ए-नबी का
जन्नत से भी मर्ग़ूब मदीने की फ़ज़ा है
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टैग : जन्नत
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere