हयात वारसी के अशआर
मिरे सय्याद को बा-वस्फ़-ए-असीरी है ये ख़ौफ़
मैं क़फ़स में भी बना लूँगा गुलिस्ताँ कोई
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इस क़दर याद है बस इ'श्क़ की रूदाद 'हयात'
जैसे देखा था कभी ख़्वाब-ए-परेशाँ कोई
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शीशे में हसीं बादा-ए-गुल-फ़ाम हसीं है
मय-ख़ाना-ए-इस्लाम का हर जाम हसीं है
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ज़ुल्फ़ों का तसव्वुर सलामों की है बारिश
मजबूर ग़म-ए-इ’श्क़ की हर शाम हसीं है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere