शाह आलम सानी के अशआर
रौशन है नूरे महर तुम्हारे से “आफ़ताब”
जो माह आफ़ताब के है फ़ैज से मुनीर
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तुम्हारे दर पे आया ‘आफ़ताब’ उसकी जो मुश्किल है
करो जल्दी से आसां, हज़रत-ए-ख़्वाजा मुईनुद्दीं
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“आफ़ताब” अपने की, अज़ बहरे-रसूले-मुख़्तार
दो मुरादें सभी, या हज़रते-ग़ौसुस-सक़लैन
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere