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शाह तुराब अली क़लंदर के अशआर
सपने में आँख पिया संग लागी।
चौंक पड़ी फिर सोई न जागी।।
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सैयाँ संग कस मोरा लागो नयनवा
आँख लगत नहीं नींद पड़त नहीं
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आँख उठाय के देखत नाहीं।
लाज भरा शरमाया बनरा
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मोहब्बत जब हुई ग़ालिब नहीं छुपती छुपाने से
फुग़ान-ओ-आह-ओ-नाला है तिरे आ’शिक़ का नक़्क़ारा
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न होता आईना हरगिज़ मुक़ाबिल
तू अपना हुस्न चमकाया तो होता
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कोई जागह नहीं पर उस से ख़ाली
ज़मीन हो अर्श हो या आसमाँ हो
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जब सो गये तुम आँख लगाय
कैसे तुराब पिया को भूलूँ
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काहे तू मोसे आँख चुरावत
संमुख तोरे मैं आपै न हूँगी
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ऐसे निठुर से काम पड़ो है
आँख लगाय मैं जी सो गई
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श्री वृषभानु किशोरी रे लोगो
मोरी तो आँख तुराब सो लागी
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere