सूफ़ी तबस्सुम के अशआर
इक लहज़ा बहे आँसू इक लहज़ा हँसी आई
सीखे हैं नए दिल ने अंदाज़-ए-शकेबाई
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इस मौसम-ए-गुल ही से बहके नहीं दीवाने
साथ अब्र-ए-बहाराँ के वो ज़ुल्फ़ भी लहराई
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere