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बाबा फ़रीद

1173 - 1266 | कोथेवाल, पाकिस्तान

बारहवीं सदी के मुबल्लिग़ और सूफ़ी बुज़ुर्ग थे, उनको क़ुरून-इ-वुस्ता के सबसे मुमताज़ और क़ाबिल-ए-एहतिराम सूफ़िया में से एक कहा गया है, उनका मज़ार पाकपतन, पाकिस्तान में है

बारहवीं सदी के मुबल्लिग़ और सूफ़ी बुज़ुर्ग थे, उनको क़ुरून-इ-वुस्ता के सबसे मुमताज़ और क़ाबिल-ए-एहतिराम सूफ़िया में से एक कहा गया है, उनका मज़ार पाकपतन, पाकिस्तान में है

बाबा फ़रीद

कविता 6

सलोक 121

सूफ़ी उद्धरण 45

दरवेश मर जाए, पर ख़ुद को संतुष्ट करने के लिए कभी क़र्ज़ ले, क्योंकि क़र्ज़ और ख़ुदा पर भरोसे में पूरब-पश्चिम का फ़र्क़ है।

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अगर ज़िंदगी है तो इल्म में है, अगर राहत है तो पहचान (मअरिफ़त) में है, अगर चाहत है तो मोहब्बत में है और अगर सुख है तो ज़िक्र में है।

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जैसे हो वैसे ही दिखो, वरना लोग तुम्हारी असलियत सामने ले आएँगे।

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ज़िंदा दिल वही है, जिसमें मोहब्बत और तड़प मौजूद हो।

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वक़्त का कोई विकल्प नहीं होता।

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मल्फ़ूज़ 15

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