फ़ज़ीहत शाह वारसी के अशआर
बज़्म-ए-गुल में वो गुल-ए-’इज़ार नहीं
फ़स्ल-ए-गुल है मगर बहार नहीं
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दीन-ओ-ईमान पर गिरी बिजली
लग गई आग पारसाई में
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न बावर हो तो सूरा-यूसुफ़ पढ़ो
ख़ुदा की ज़बाँ पर है अज़़कार-ए-इ’श्क़
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हमारे घर में आ कर यार अटका
रक़ीबों की नज़र में ख़ार अटका
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere