Sufinama
Gharib Das's Photo'

غریب داس

1717 - 1878 | روہتک, بھارت

غریب داس کی ساکھی

12
Favorite

باعتبار

پنچھی اڑے آکاس کوں کت کوں کنہا گون

یہ من ایسے جات ہے جیسے بدبد پون

نرگن نرمل نام ہے اوگت نام ابنچ

نام رتے سو دھنپتی اور سکل پر پنچ

لے کا لاہا لیجیے لے کی بھر لے بھار

لے کی بنیجی کیجیے لے کا ساہوکار

نام ابھے پد نرملا اٹل انوپم ایک

یہ سودا ست کیجیے بنیجی بنج الیکھ

اس ماٹی کے محل میں ناتر کیجئے مود

راؤ رنک سب چلیں گے آپے کوں لے سودھ

صاحب صاحب کیا کرے صاحب تیرے پاس

سہس اکیسوں سودھی لے الٹ اپوٹھا سوانس

پھونک پھانک فارغ کیا کہیں نہ پایا کھوج

چیت سکئے تو چیتیے یہ مایہ کے چوج

चेत सकै तो चेतिये कूकै संत सुमेर

चौरासी कूँ जात है फेर सकै तो फेर ।।

यह मन मंजन कीजिये रे नर बारंबार

साईं से कर दोसती बिसर जाय संसार ।।

जा घट भग्ति बिलास है ता घट हीरा नाम

जो राजा पृथ्वी-पती का घर मुख्ते दाम ।।

नंगा आया जगत में नंगा ही तू जाय

बिच कर ख्वाबी ख्याल है मन माया भरमाय ।।

जाते कूँ नर जान दे रहते कूँ ले राख

सत्त सब्द उर ध्यान घर मुख सूँ कूड़ भाख ।।

रतन रसायन नाम है मुक्ता महल मजीत

अंधे कूँ सूझै नहीं आगे जलै अँगीठ ।।

निरबानी के नाम से हिल मिल रहना हंस

उर में करिये आरती कधी बूड़ै बंस ।।

रंचक नाम सँभारिये परपंची कूँ खोय

अंत समय आनंद है अटल भगति देउँ तोय ।।

मात हिता सुत बंधवा देखे कुल के लोग

रे नर देखत फूँकिये करते हैं सब सोग ।।

गगन मँडल में रम रहा तेरा संगी सोय

बाहर भरमे हानि है अंतर दीपक जोय ।।

यह संजम सैलान कर यह मन यह बैराग

बन बसती कितही रहौ लगे बिरह का दाग ।।

महल मँडेरी नीम सब चलै कौन के साथ

कागा रौला हो रहा कछू लागा हाथ ।।

कुटिल बचन कूँ छाँड़ि दे मान मनी कूँ मार

सतगुरू हेला देत जनि डूबै काली धार ।।

जनम जनम को मैल है जनम जनम की घात

जड़ नर तोहि सूझै नहीं ले चला चोर बिरात ।।

चित के अंदर चाँदना कोटि सूर ससि भान

दिल के अंदर देहरा काहे पूज पखान ।।

मन माया की डुगडुगी बाजत है मिरदंग

चेत सकै तो चेतिये जाना तुझे निहंग ।।

दया धर्म दो मुकट हैं बुध्दि बिबेक बिचार

हर दम हाजिर हूजिये सौदा त्यारंत्यार ।।

गलताना गैबी चला माटी पिंडय जोख

आया सो पाया नहीं अन आये कूँ रोक ।।

ऐसे लाहा लीजिये संत समागम सेव

सतगुरू साहब एक है तीनों अलख अभेव ।।

अंत समय को बात सुन तेरा संगी कौन

माटी में माटी मिलै पवनहिं मिलिहैं पौन ।।

ये बादर सब धुंध के मन माया चितराम

दीखै सो रहता नहीं सप्तपुरी सब धाम ।।

नाम बिना निबहै नहीं करनी करिहै कोट

संतों की संगत तजी बिष की बाँधी पोट ।।

रतन खजाना नाम है माल अजोख अपार

यह सौदा सत कीजिये दुगुने तिगुने चार ।।

भगति गरीबी बन्दगी संतों सेतीं हेत

जिन्ह के निःचल बास है आसन दीजे सेत ।।

झिल-मिल दीपक तेज कै दसों दिसा दरहाल

सतगुरू की सेवा करै पावै मुक्ता माल ।।

धन संचै तो संत का और तेरे काम

अठसठ तीरथ जो करे नाहीं संत समान ।।

नैना निरमल नूर के बैना बानी सार

आरत अंजन कीजिये डारो सिर से भार ।।

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI