हरी चंद अख़्तर के अशआर
सुकून-ए-मुस्तक़िल दिल बे-तमन्ना शैख़ की सोहबत
ये जन्नत है तो इस जन्नत से दोज़ख़ क्या बुरा होगा
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ब-रोज़-ए-हश्र हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ ख़ुदा होगा
फ़रिश्तों के लिखे और शैख़ की बातों से क्या होगा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere