Font by Mehr Nastaliq Web
Sufinama
noImage

जिगर वारसी

1871 - 1958 | सीतापुर, भारत

जिगर वारसी के अशआर

दावर-ए-हश्र ये है हश्र में अरमाँ मुझ को

बदले जन्नत के मिले कूचा-ए-जानाँ मुझ को

जिस तरफ़ कूचा-ए-क़ातिल में गुज़र होता है

नज़र आते हैं उधर मौत के सामाँ मुझ को

रात को बे-ख़बर रहे आप तो ख़्वाब-ए-नाज़ में

नींद आई सुब्ह तक हम को शब-ए-दराज़ में

देख कर आसमाँ को हम तो ज़मीं में गड़ गए

जब कहीं जगह मिली आप की बज़्म-ए-नाज़ में

और किसी का नूर है उस मह-ए-दिल-नवाज़ में

अ’क्स को देख बे-ख़बर आईना-ए-मजाज़ में

फ़ातिहा पढ़ते रहे हँसते रहे रोते रहे

क़ब्र पर कर उन्होंने क़ौल पूरा कर दिया

साथ मेरा तेरा आईना रहता था

वो भी दिन याद हैं जब सामने तू रहता था

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

Recitation

बोलिए