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मियाँ मीर क़ादरी

1550 - 1635 | लाहौर, पाकिस्तान

मियाँ मीर क़ादरी

सूफ़ी उद्धरण 30

लिबास ऐसा होना चाहिए कि कोई पहचान सके कि तुम तसव्वुफ़ की राह के मुसाफ़िर हो।

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सच्चा सूफ़ी वह है, जिस की निगाह में पत्थर और नगीने एक हों।

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सूफ़ी जब कामिल हो जाता है और उस का दिल हर ख़तरे से पाक हो जाता है, तो उसे किसी चीज़ से नुक़सान नहीं पहुँच सकता।

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सूफ़ी वो है, जो 'कुछ नहीं' हो जाए। अगर वो अब भी 'हो', तो उसे 'होना' नहीं चाहिए।

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हक़ की तलब आसान नहीं। जब तक तुम हक़ की तलाश में अकेले नहीं हो जाते, तब तक उसे नहीं पा सकते।

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