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परिचय
कलाम23
फ़ारसी सूफ़ी काव्य4
ना'त-ओ-मनक़बत12
सलाम1
गीत3
कृष्ण भक्ति सूफ़ी कलाम2
अब्दुल हादी काविश के अशआर
यही ईमान है अपना यही अपना अ’मल 'काविश'
सनम के इक इशारे पर हर इक शय को लुटा देना
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टैग : ईमान
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जिस्म का रेशा रेशा मचले दर्द-ए-मोहब्बत फ़ाश करे
इ’शक में 'काविश' ख़ामोशी तो सुख़नवरी से मुश्किल है
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टैग : ख़ामोशी
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असीर-ए-गेसू-ए-पुर-ख़म बनाए पहले आशिक़ को
निकाले फिर वो पेच-ओ-ख़म कभी कुछ है कभी कुछ है
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टैग : असीर
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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाँड़ चला कर
साँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
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टैग : चाँद
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तो-को बताऊँ सुन रे सखी री मुर्शिद पिया की सूरत किस की
यही है सूरत शेर-ए-ख़ुदा की बाँकी चितवन कारी अँखियाँ
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टैग : ख़ुदा
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ये आदाब-ए-मोहब्बत है तिरे क़दमों पे सर रख दूँ
ये तेरी इक अदा है फेर कर मुँह मुस्कुरा देना
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टैग : अदा
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तू लाख करे इंकार मगर बातों में तिरी कौन आता है
ईमान मिरा ये मेरा यक़ीं तू और नहीं मैं और नहीं
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टैग : ईमान
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अपने हाथों मेहंदी लगाई माँग भी मैं ने देखो सजाई
आए पिया घर रिम-झिम बरसे जाओ बता दो सावन को
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टैग : घर
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उठ के अँधेरी रातों में हम तुझ को पुकारा करते हैं
हर चीज़ से नफ़रत हम को हुई हम जन्नत-ए-फ़र्दा भूल गए
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टैग : अँधेरा
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आग लगी वो इशक की सर से मैं पाँव तक जला
फ़र्त-ए-ख़ुशी से दिल मिरा कहने लगा जो हो सो हो
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टैग : ख़ुशी
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दीन-ओ-ईमाँ क्या और क्या है धरम खोल दिया अब तो नाम-ए-ख़ुदा ने भरम
चश्म-ए-मुर्शिद ने की ऐसी जादूगरी कुछ भी मुझ को न भाए तो मैं क्या करूँ
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टैग : ख़ुदा
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साग़र शराब-ए-इ'श्क़ का पी ही लिया जो हो सो हो
सर अब कटे या घर लुटे फ़िक्र ही क्या जो हो सो हो
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टैग : घर
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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाण चला कर
सँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
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टैग : चाँद
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उठ के अँधेरी रातों में हम तुझ को पुकारा करते हैं
हर चीज़ से नफ़रत हम को हुई हम जन्नत-ए-फ़र्दा भूल गए
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टैग : जन्नत
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आकाश की जगमग रातों में जब चाँद सितारे मिलते हैं
दिल दे दे सनम को तू भी ये क़ुदरत के इशारे मिलते हैं
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टैग : चाँद
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जाको कोई पकड़े तो कैसे काम करत है नज़र न आए
चुपके चुपके सेंध लगावे दिन होवे या अँधेरी रतियाँ
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टैग : अँधेरा
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इ’ल्म और फ़ज़्ल के दीन-ओ-ईमान के अ’क़्ल पर मेरी 'काविश' थे पर्दे पड़े
सारे पर्दे उठा कर कोई अब मुझे अपना जल्वा दिखाए तो मैं क्या करूँ
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टैग : ईमान
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मिल गया राह में मुझ को जब वो सनम लाख दिल को सँभाला किया ज़ब्त-ए-ग़म
दिल में हसरत लिए चंद आँसू मगर दफ़्अ'तन मुस्कुराए तो मैं क्या करूँ
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टैग : ग़म
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चलो आओ 'काविश' कि कांधा लगाएँ
अली की ख़ुदा ने उठाई है डोली
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टैग : ख़ुदा
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सुरूर-ओ-कैफ़ का नग़्मा ग़म-ओ-अंदोह का नौहा
तिलिस्म-ए-ज़ीस्त की सरगम कभी कुछ है कभी कुछ है
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टैग : ग़म
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अ’ली तो-को जानूँ ख़ुदा तो-को जानूँ
मैं रखती हूँ जग से तबीअ'त नियारी
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टैग : ख़ुदा
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कूचे में तिरे ऐ जान-ए-ग़ज़ल ये राज़ खुला हम पर आ कर
ग़म भी तो इनायत है तेरी हम ग़म का मुदावा भूल गए
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टैग : ग़म
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जीवन की उलझी राहों में जब घोर अंधेरा आता है
हाथों में लिए रौशन मशअ'ल तो गुरु हमारे मिलते हैं
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टैग : अँधेरा
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इस पाप की नगरी में हर ओर अंधेरा है
उजियार में बस वो है जो तुझ को पिया चाहे
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टैग : अँधेरा
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जा को कोई पकड़े तो कैसे काम करत है नज़र न आए
चुपके चुपके सेंध लगावे दिन होवे या अँधेरी रतियाँ
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टैग : अँधेरा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere