Sufinama
Amir Khusrau's Photo'

अमीर ख़ुसरौ

1253 - 1325 | दिल्ली, इंडिया

उर्दू और फ़ारसी का एक पसंदीदा सूफ़ी शाइ’र

उर्दू और फ़ारसी का एक पसंदीदा सूफ़ी शाइ’र

उपनाम : 'ख़ुसरौ'

मूल नाम : अबुल हसन यमीनुद्दीन

जन्म :पटियाली, उत्तर प्रदेश

निधन : दिल्ली, इंडिया

अमीर ख़ुसरो की पैदाइश 651 हिज्री 1253 ई’स्वी में मौजूदा ज़िला काँसी रामनगर, उतर प्रदेश के पटियाली में हुई। नाम यमीनुद्दौला और लक़ब अबुल-हसन था। आम बोल-चाल में आपको अमीर ख़ुसरो कहा जाता है। आपके वालिद अमीर सैफुद्दीन लाचीन क़ौम के एक तुर्क सरदार थे। मंगोलों के हमलों के वक़्त हिन्दुस्तान आए और पटियाली (आगरा) में सुकूनत इख़्तियार किया। उनकी वालिदा हिन्दुस्तानी थीं। आठ साल की उ’म्र में यतीम हुए। कुछ अ’र्सा बा’द ये ख़ानदान दिल्ली मुंतक़िल हो गया। अमीर ख़ुसरौ ने सल्तनत-ए-दिल्ली के आठ बादशाहों का ज़माना देखा। आपने बर्र-ए-सग़ीर में इस्लामी सल्तनत के इब्तिदाई अदवार की सियासी, समाजी और सक़ाफ़्ती ज़िंदगी में सरगर्म हिस्सा लिया। महबूब-ए-इलाही ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के बड़े चहेते मुरीद थे। ख़ुसरो को भी मुर्शिद से इंतिहाई अ’क़ीदत थी| ख़ुसरो ने हर सिन्फ़-ए-शे’र, मस्नवी, क़सीदा, ग़ज़ल, उर्दू दोहे, पहेलियाँ, गीत वग़ैरा में तब्अ’-आज़माई की। ग़ज़ल में पाँच दीवान याद-गार छोड़े। हिन्दुस्तानी मौसीक़ी में तराना, क़ौल और कलबाना उन्ही की ईजाद है। बा’ज़ हिन्दुस्तानी रागनियों में हिन्दुस्तानी पैवंद लगाए। रागनी (एमन कल्याण) जो शाम के वक़्त गाई जाती है उन्ही की ईजाद है। कहते हैं कि सितार पर तीसरा तार आप ही ने चढ़ाया। ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीद थे। उन्हीं के क़दमों में दफ़्न हुए। फ़ारसी कलाम की मिसाल काफ़िर इ’श्कम, मुस्लमानी मरा दरकार नीस्त हर रग-ए-मन तार गश्ता, हाजत-ए-ज़ुन्नार नीस्त अज़ सर-ए-बालीन-ए -मन बरख़ेज़ ऐ नादाँ तबीब दर्द-मंद-ए- इ’श्क़ रा दारू ब-जुज़ दीदार नीस्त ना-ख़ुदा बर कश्ती-ए- मा गर न-बाशद, गो मबाश मा ख़ुदा दारेम मारा ना -ख़ुदा दर-कार नीस्त ख़ल्क़ मी‌- गोयद कि ख़ुसरो बुत‌-परस्ती मी-‌कुनद आरी-आरी मी-‌कुनम बा-ख़ल्क मा रा कार नीस्त उर्दू कलाम ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार सेज वो सूनी देख के रोऊँ मैं दिन रैन पिया-पिया मैं करत रहूँ पहरों, पल-भर सुख न चैन अमीर ख़ुसरो शाइ’री से ही नहीं बल्कि मौसीक़ी से भी काफ़ी दिल-चस्पी रखते थे। हिन्दुस्तानी क्लासिकी मौसीक़ी की एक अहम शख़्सियत भी माने जाते हैं। क्लासिकी मौसीक़ी के अहम साज़ तबला और सितार उन्ही की ईजाद मानी जाती है। फ़न्न-ए-मौसीक़ी के अज्ज़ा जैसे ख़याल और तराना भी उन्हीं की ईजाद है दुनिया में उर्दू का पहला शे’र अमीर ख़ुसरो ही की तरफ़ मंसूब है। इस सिलसिले में उर्दू के इब्तिदाई मुजिदीन में उनका नाम शुमार है।

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