Sufinama
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औघट शाह वारसी

1874 - 1952 | मुरादाबाद, इंडिया

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कलाम 19

दोहा 55

'औघट' पूजा-पाट तजो लगा प्रेम का रोग

सत्त-गुरु का ध्यान रहे यही है अपना जोग

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दया गुरु की दिन दूनी और गुरु छोड़े हाथ

गुरु बसे संसार में और गुरु हमारे साथ

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रोके काम कामना इंद्री राखे साध

सुंदर के तब दर्शन करे नहीं तो है अपराध

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सजनी पाती तब लिखूँ जो पीतम हो परदेस

तन में मन में पिया बिराजैं भेजूँ किसे सँदेस

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साधू 'औघट' सबद को साधे जोगी करे सब जोग

इस डगरिया मिलें गोसाईं नदी नाव संजोग

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फ़ारसी कलाम 1

 

मनक़बत-ना'त 3

 

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