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Sufinama
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रिंद लखनवी

1797 - 1857

ख़्वाजा आतिश लखनवी के शागिर्द-ए-रशीद

ख़्वाजा आतिश लखनवी के शागिर्द-ए-रशीद

रिंद लखनवी के अशआर

मुश्तरक शब से हुआ ख़ून-ए-जिगर अश्कों में

रात से रंग बदलने लगे आँसू अपना

राम किस तरह करेगा कोई सय्याद उसे

अपने साए से भी रम करता है आहू अपना

पुश्त-ए-पा मारें क्यों हिम्मत-ए-गर्दूं पर ‘रिंद’

शल नहीं फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से अभी बाज़ू अपना

बू-ए-गुल से मुझे धोका दे उस की बू का

चोचला रहने दे बाद-ए-सहरी तू अपना

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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