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ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़

1715 - 1788 | पटना, भारत

अ’ज़ीमाबाद के मुम्ताज़ सूफ़ी शाइ’र और बारगाह-ए-हज़रत-ए- इ’श्क़ के रूह-ए-रवाँ

अ’ज़ीमाबाद के मुम्ताज़ सूफ़ी शाइ’र और बारगाह-ए-हज़रत-ए- इ’श्क़ के रूह-ए-रवाँ

ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़ के अशआर

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क़ातिल ने पाएमाल किया जब से ख़ून-ए-'इश्क़'

सब शग़्ल छोड़ कर वो हुआ है हिना-परस्त

मज़मून ये 'इश्क़' दिल में मेरे आया

इस रम्ज़-ए-रिसालत को नज़र से पाया

दिलबर में दिल या दिलबर दिल में है

'इ’श्क़' उस को बता किस तरह से ग़ैर कहूँ

पहुँचा है जब से इ’श्क़ का मुझ को सलाम-ए-ख़ास

दिल के नगीं पे तब से खुदाया है नाम-ए-ख़ास

जिस की नज़र 'इ’श्क़' के ऊपर पड़ी

चश्म के तईं अपनी वो तर कर गया

गरचे कैफ़ियत ख़ुशी में उस की होती है दो-चंद

पर क़यामत लुत्फ़ रखती है ये झुँझलाने की तरह

जिस दिन से बू-ए-ज़ुल्फ़ ले आई है अपने साथ

इस गुलशन-ए-जहाँ में हुआ हूँ सबा-परस्त

तनज़ीह से मैं आलम-ए-तश्बीह में आह

गोया हूँ ज़बाँ से ला-इलाहा-इल्लल्लाह

रही ये आरज़ू आख़िर के दम तक

पहुँचा सर मिरा तेरे क़दम तक

जल ही गया फ़िराक़ तू आतिश से हिज्र की

आँखों में मिरी रह सका यारो इंतिज़ार

इस चमन की सैर में गुल-एज़ार

'इ’श्क़' की आँखों में तूफ़ाँ या-नसीब

मक़्दूर क्या जो कह सुकूँ कुछ रम्ज़-ए-इ’श्क़ को

जूँ शम्अ' हूँ अगरचे सरापा ज़बान-ए-इ’श्क़

चेहरे पे जो तेरे नज़र कर गया

जान से वो अपनी गुज़र कर गया

सरसब्ज़ गुल की रखे ख़ुदा हर रविश बहार

बाग़बाँ नसीब हो तुझ को बला-ए-गुल

सरसब्ज़ गुल की रखे ख़ुदा हर रविश बहार

बाग़बाँ नसीब हो तुझ को बला-ए-गुल

कुछ आरज़ू से काम नहीं 'इ’श्क़' को सबा

मंज़ूर उस को है वही जो हो रज़ा-ए-गुल

मय-ख़ाना में ख़ुदी को नहीं दख़्ल शैख़-जी

बे-ख़ुदी हुआ है जिन ने पिया है वो जाम-ए-ख़ास

मैं हाथ में हूँ बाद के मानिंद पर-ए-काह

पाबंद घर का हूँ मुश्ताक़ सफ़र का

'इ’श्क़' आ’शिक़ हुआ उसी कूँ देख

दिल-ए-नालाँ ब-रंग-ए-ऊ’द हुआ

इस चमन की सैर में गुल-एज़ार

'इश्क़' की आँखों में तूफ़ाँ या-नसीब

आतिश से गुल की दाग़ मगर 'इश्क़' खाए थे

आई जो पेशवा तुझे लेने को नौ-बहार

लैल-ओ-नहार चाहे अगर ख़ूब गुज़रे 'इ’श्क़'

कर विर्द उस के नाम को तू सुब्ह-ओ-शाम का

सूरत-परस्त-ओ-राज-परस्त-ओ-सनम-परस्त

मा'नी में देखिये तो सभी हैं ख़ुदा-परस्त

आँख जो देख हो गए मग़रूर

दिल पुकारा हनूज़ दिल्ली दूर

उस बुलबुल-ए-असीर की हसरत पे दाग़ हूँ

मर ही गई क़फ़स में सुनी जब सदा-ए-गुल

उस को निकाले कोई किस तौर से

तीर-ए-मिज़ा सीने में घर कर गया

कहियो क़ासिद पयाम उस को कि तेरे हिज्र से

जाँ-ब-लब पहुँचा नहीं आता है तू याँ अब तलक

कर क़त्ल शौक़ से मैं तसद्दुक़ हुआ हुआ

सरकार नहीं है फ़िक्र जो हुआ इंतिज़ार-ए-ख़ास

क्यूँकर चलें गुलशन-ए-दुनिया में ये लवें

हो गई है मियाँ आह की तासीर हवा पर

लज़्ज़तें दीं ग़ाफ़िलों को क़ासिम-ए-हुशियार ने

इ’श्क़ की क़िस्मत हुई दुनिया में ग़म खाने की तरह

सूरत-परस्त-ओ-राज-परस्त-ओ-सनम-परस्त

मा'नी में देखिये तो सभी हैं ख़ुदा-परस्त

इस तंग-ना-ए-दहर से बाहर क़दम को रख

है आसमाँ ज़मीं से परे वुसअत-ए-मज़ार

दिल तो और ही मकाँ में फिरता है

ज़मीं है आसमाँ है याद

लज़्ज़तें दीं ग़ाफ़िलों को क़ासिम-ए-हुशियार ने

इ’श्क़ की क़िस्मत हुई दुनिया में ग़म खाने की तरह

'इ’श्क़' किस बात पर लगाया दिल

थी बुतों की तो दिलबरी मशहूर

लूटेगा सब बहार तिरी शहना-ए-ख़िज़ाँ

बुलबुल पर कर ले तू ज़र-ए-गुल को निसार शाख़

गुलज़ार में दुनिया के हूँ जो नख़्ल-ए-भुचम्पा

ख़्वाहिश समर की मियाँ ख़ौफ़ क़हर का

ग़ैर-ए-हक़ से जो हक़ को माँग लिया

शैख़-जी पर करे खिल्ली हूर

जब्र इस इस तरह उठाए हैं

देख आलम मुझे हुआ मजबूर

लूटेगा सब बहार तिरी शहना-ए-ख़िज़ाँ

बुलबुल पर कर ले तू ज़र-ए-गुल को निसार शाख़

मर ही गए जफ़ाओं से क़ातिल तड़प-तड़प

मैं क्या कि और कितने ही बिस्मिल तड़प-तड़प

टुक एक इंसाफ़ से अगर देखो

'इ’श्क़' सा कोई चश्म-ए-तर देखा

फूले नहीं समाते हो जामा में मिस्ल-ए-गुल

पहुँचा है तुम को आज कसो का पयाम-ए-ख़ास

चलता हूँ राह-ए-इ’श्क़ में आँखों से मिस्ल-ए-अश्क

फूटें कहीं ये आबले सरसब्ज़ होवें ख़ार

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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