क़ादिर बख़्श बेदिल के अशआर
वोई मारे अनल-हक़ दम करे इज़हार सिर्र बहम
कोई बाँधै कमर मोहकम जो आपे-आप सूँ लड़ना
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नहीं बंदा हक़ीक़त में समझ असरार मा'नी का
ख़ुदी का वहम बरहम ज़न पिछे बे-ख़ुद ख़ुदाई कर
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जोई अव्वल सोई आख़िर जोई ज़ाहिर सोई बातिन
ख़ुदी के तर्क में जल्दी से मख़्फ़ी सब अ'याँ होगा
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तेरे नैन-ए-पुर-ख़ुमार कूँ सरमस्त-ए-बादा-नाज़
या बे-ख़ुदी का जाम या सहर-ए-बला कहूँ
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जग में समझ कि ग़ैर-ए-ख़ुदा और कुछ नहीं
वोही दुकान-दार ख़रीदार और वोही मताअ'
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मा'शूक़-ए-बे-परवाह आगे गरचे अ'बस है इल्तिजा
उ'श्शाक़ को बेहतर नहीं ज़ीं शेवा-कार-ए-दिगर
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अंधारे में पड़ा हूँ कसरत के वहम से
वहदानियत का लुत्फ़ सूँ रौशन चराग़ बख़्श
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'अत्तार'-ए-मन ख़ुदा का नकारा बजाया ख़ूब
आरिफ़ ऐसे सुख़न में है बे-इख़्तियार महज़
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अंधारे में पड़ा हूँ कसरत के वहम से
वहदानियत का लुत्फ़ सूँ रौशन चराग़ बख़्श
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टैग : अँधेरा
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वो है लैला-ओ-मजनूँ वही है बुलबुल-ओ-गुल
वही है शक्कर-ओ-मगस ला-इलाहा-इल्ला-हू
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बुलबुल सिफ़त ऐ गुल-बदन इस बाग़ में हर सुब्ह
तेरी बहारिस्तान का दीवाना हूँ दीवाना हूँ
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दिवाली टोड़ कसरत की जिस्म से अब जुदाई कर
तजल्ला देख वहदत का घर अपने रोशनाई कर
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रोज़-ए-अज़ल अलस्त का मज़कूर हो चुका
साहिब-दिलाँ की कान पर आवाज़ है हनूज़
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अब्र तुम्हारे कूँ जो है ब-शक्ल हिलाल-ए-ई’द
मेहराब-ए-सज्दा ताअ'त-ए-अहल-ए-सफ़ा कहूँ
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ऐ गुल-बदन मेरा तूँ चमन से न जा न जा
रूही फ़िदाका या'नी वतन से न जा न जा
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तेरे हुस्न की देख तजल्ली ऐ रश्क-ए-हूर
सूरज कहूँ कि चाँद कि नूर-ए-ख़ुदा कहूँ
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere