तुराब अली दकनी के अशआर
चतुर्भुज नाम है उस का कि जिस को वासुदेव कहते
छबेली छब ओ दामोदर की त्रिभंगी प्यारी है
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गुनह कुछ होर भी करना तो कर ले आरज़ू मत रख
नहीं तेरे गुनाहाँ कूँ तो कच्चा हद्द-ओ-शुमार आख़िर
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मिस्र सें ले कर ख़बर यूसुफ़ की जो क़ासिद गया
दीदा-ए-या’क़ूब रौशन बू-ए-पैराहन किया
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बेवफ़ाई उन सियह-चश्माँ की देखा जब सती
मिस्ल-ए-आईना हो हैराँ दिल है सरगर्दां मिरा
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तब हुआ इज़हार ए'जाज़-ए-असा-ए-मूसवी
जब ओ चोब-ए-ना-तराशीदा के तईं सोहन किया
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असीर-ए-काकुल-ए-ख़म-दार हूँ मैं
गिरफ़्तार-ए-कमंद-ए-यार हूँ मैं
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ख़ुश नहीं इफ़शा-ए-राज़-ए-दिल-रुबा पेश-ए-उमूम
हातिफ़-ए-ग़ैबी मुझे इज़हार कहता है कि बोल
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नहीं यारो ख़ुदा हरगिज़ तुम्हारे सुँ जुदा हैगा
जिधर देखे उधर ममलू सदा नूर-ए-ख़ुदा हैगा
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'तुराब' होता है अश्क-ए-बाराँ अपस में तूँ बोल राज़-दाराँ
हर एक गुलशन में नौ-बहाराँ घड़ी में कुछ होर घड़ी में कुछ हैं
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किया जो मुझ तरफ़ गुल-रू नज़र आहिस्ता आहिस्ता
वो पहुँची बुलबुल-ए-दिल कूँ ख़बर आहिस्ता आहिस्ता
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'तुराब'-ए-आशिक़-ए-गेसू-दराज़े
असीर-ए-रिश्ता-ए-ज़ुन्नार हैगा
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अरे दिल मिस्ल-ए-बुलबुल चुप हमेशा नाला-ज़न है तूँ
कहीं गुल-पैरहन गुल-रू की पाया कुछ ख़बर है रे
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देखे जो यक-ब-यक गुल-रू तुम्हारी बे-हिजाबी हम
मिसाल-ए-बुलबुल-ए-शैदा किए अपनी ख़राबी हम
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कर गरेबाँ चाक अपना गुल नमत भुहीं पर गिरा
दर्द-ए-दिल बुलबुल सौं सुन कर ओ गुल-ए-ख़ंदाँ मिरा
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चला आता है जो सय्याद-ए-ज़ालिम दाम-ए-गेसू ले
कि शायद आहू-ए-दिल कूँ करेगा ओ शिकार आख़िर
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हमेशा दामन-ए-गुल मिस्ल-ए-शबनम
हुआ मस्कन मिरे तिफ़्ल-ए-नेन का
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न आया क्या सबब अब अलग रहा दिल-ए-इंतिज़ार आख़िर
जहाँ होवे वहाँ जा कर मुझने होना निसार आख़िर
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अरे दिल क्यूँ हुआ है रे अबस तूँ वहशी-ए-दश्ती
किसी आहू-निगहाँ की तुजे अच्छर का छर है रे
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दीदा-ए-बीना-ओ-नाबीना के तईं रौशन किया
यक निगह में गुलख़न-ए-वीराँ कूँ ओ गुलशन किया
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नाला-ए-बुलबुल हुआ नाक़ूस-ए-दैर
गुल किया जिस वक़्त गुलज़ार-ए-बुताँ
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ऐ 'तुराब' जब गुल-बदन के दर्द सूँ गिर्यां किया
दामन-ए-गुल पर मिरा हर अश्क दुर्दाना हुआ
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बाँद कर गुलनार चीरा गुल-बदन जाता है बाग़
आज ख़ातिर में तिरे बुलबुल की मिस्मारी है क्या
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नहीं यारो ख़ुदा हरगिज़ तुम्हारे सुँ जुदा हैगा
जिधर देखे उधर ममलू सदा नूर-ए-ख़ुदा हैगा
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टैग : ख़ुदा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere