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फ़ना बुलंदशहरी

- 1986 | कराची, पाकिस्तान

हिंद-ओ-पाक के मक़बूल-ए-ज़माना शाइ’र

हिंद-ओ-पाक के मक़बूल-ए-ज़माना शाइ’र

फ़ना बुलंदशहरी के अशआर

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जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया

हुईं जिस पे तेरी नवाज़िशें वो बहार बन के सँवर गया

है वज्ह कोई ख़ास मिरी आँख जो नम है

बस इतना समझता हूँ कि ये उन का करम है

कर के सिंघार आए वो ऐसी अदा के साथ

आईना उन को देख कर हैरान हो गया

मुझ को ख़ुदा से आश्ना कोई भला करेगा क्या

मैं तो सनम-परस्त हूँ मेरा कोई ख़ुदा नहीं

देखा जो उस सनम को तो महसूस ये हुआ

जल्वा ख़ुदा का सूरत-ए-इंसान हो गया

मैं हूँ एक आशिक़-ए-बे-नवा तू नवाज़ अपने पयाम से

ये तिरी रज़ा पे तिरी ख़ुशी तू पुकार ले किसी नाम से

जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए

इस आ’लम-ए-हस्ती का आलम ही बदल जाए

बे-हिजाबाना वो सामने गए और जवानी जवानी से टकरा गई

आँख उन की लड़ी यूँ मिरी आँख से देख कर ये लड़ाई मज़ा गया

कर अपनी नज़र से मिरे ईमान का सौदा

दोस्त तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम है

किस तरह छोड़ दूँ यार मैं चाहत तेरी

मेरे ईमान का हासिल है मोहब्बत तेरी

अपना बना के सनम तुम ने जो आँख फेर ली

ऐसा बुझा चराग़-ए-दिल फिर ये कभी जला नहीं

बे-ख़ुदी में भी तिरा नाम लिए जाते हैं

रोग ये कैसा लगा है तिरे मस्ताने को

तेरे दर से उठा हूँ उठूँगा दोस्त

ज़िंदगी तेरे बिना ख़्वाब है अफ़्साना है

देखा जो उस सनम को तो महसूस ये हुआ

जल्वा ख़ुदा का सूरत-ए-इंसान हो गया

मुझ को तन्हा देखने वाले समझें राज़-ए-इश्क़

मेरी तन्हाई के लम्हे यार के आग़ोश हैं

इ'श्क़ में चाँद-सितारों की हक़ीक़त क्या हो

जल्वा-ए-यार पे क़ुर्बान सहर होती है

जुनूँ ज़ाहिर हुआ रुख़ पर ख़ुदी पर बे-ख़ुदी छाई

ब-क़ैद-ए-होश मैं जब भी क़रीब-ए-आस्ताँ पहुँचा

सर जब से झुकाया है दर-ए-यार पे मैं ने

मेहराब-ए-ख़ुदी जल्वा-गह-ए-शम-ए-हरम है

मिरे दाग़-ए-दिल वो चराग़ हैं नहीं निस्बतें जिन्हें शाम से

उन्हें तू ही के बुझाएगा ये जले हैं तेरे ही नाम से

तू बिछड़ गया है जब से मिरी नींद उड़ गई है

तिरी राह तक रहा हूँ मिरे चाँद अब तो जा

बा-होश वही हैं दीवाने उल्फ़त में जो ऐसा करते हैं

हर वक़्त उन्ही के जल्वों से ईमान का सौदा करते हैं

फिर दर्द-ए-जुदाई का झगड़ा रहे कोई

हम नाम तिरा ले कर मर जाएँ तो अच्छा हो

तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं

दुनिया भी मिरे वास्ते जन्नत से कम नहीं

किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं

ऐसा मिला है दर्द-ए-दिल जिस की कोई दवा नहीं

दिखाते मुझे जल्वा मगर इतना करते

आप का ग़म मिरी तस्कीन का सामाँ होता

हर घड़ी पेश-ए-नज़र इ’श्क़ में क्या क्या रहा

मेरा दिल बस तिरी तस्वीर का दीवाना रहा

अपनी क़िस्मत पे फ़रिश्तों की तरह नाज़ करूँ

मुझ पे हो जाए अगर चश्म-ए-इ’नायत तेरी

जज़्बा-ए-इश्क़ में जन्नत की तमन्ना कैसी

ये बुलंदी तो मिरी गर्द-ए-सफ़र होती है

ज़ब्त-ए-दिल ये कैसी क़यामत गुज़र गई

दीवानगी में चाक गरेबान हो गया

तिरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है

तिरे ग़म से मेरे जानाँ मिरे दिल में रौशनी है

कि ख़िरद की फ़ित्नागरी वही लुटे होश छा गई बे-ख़ुदी

वो निगाह-ए-मस्त जहाँ उठी मिरा जाम-ए-ज़िंदगी भर गया

ग़म-ए-जानाँ को जान-ए-जाँ बना ले देख दीवाने

ग़म-ए-जानाँ से बढ़ कर और कोई ग़म नहीं हो

मैं हूँ एक आ’शिक़-ए-बे-नवा तू नवाज़ अपने पयाम से

ये तिरी रज़ा पे तिरी ख़ुशी तू पुकार ले किसी नाम से

अपने दामन में छुपा ले मुझे महबूब मिरे

मिरी बिगड़ी हुई क़िस्मत का सितारा हो जा

तिरी तलब तेरी आरज़ू में नहीं मुझे होश ज़िंदगी का

झुका हूँ यूँ तेरे आस्ताँ पर कि मुझ को एहसास-ए-सर नहीं है

मिरे नाम की निशानी रहे जहाँ में बाक़ी

मिरी जान लेने वाले मिरी क़ब्र भी मिटा जा

जमाल-ए-यार पे यूँ जाँ निसार करता हूँ

फ़ना के बा'द 'फ़ना' घर में रौशनी होगी

अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता

चराग़-ए-आरज़ू जल कर कभी मद्धम नहीं होता

अपना बना के सनम तुम ने जो आँख फेर ली

ऐसा बुझा चराग़-ए-दिल फिर ये कभी जला नहीं

ग़म-ए-दुनिया ग़म-ए-हस्ती ग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दिल

कितने उन्वान मिले हैं मिरे अफ़्साने को

हाँ वही इ’श्क़-ओ-मोहब्बत की जिला होती है

जो इ’बादत दर-ए-जानाँ पे अदा होती है

मिरी इल्तिजा है तुझ से मिरी बंदगी बदल दे

कि तिरे करम मिरी जाँ मिरी लौ लगी हुई है

निगाह-ए-यार मिरी सम्त फिर उठी होगी

सँभल सकूँगा मैं ऐसी ये बे-ख़ुदी होगी

बदलती ही नहीं क़िस्मत मोहब्बत करने वालों की

तसव्वुर यार का जब तक 'फ़ना' पैहम नहीं होता

मौत से आप की उल्फ़त ने बचा रक्खा है

वर्ना बीमार-ए-ग़म-ए-हिज्र में क्या रक्खा

मिरी लौ लगी है तुझ से ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे

तिरा नाम है मसीहा मिरे दर्द की दवा दे

उस को पाना है तो कश्ती से किनारा कर ले

डूब कर बहर-ए-मोहब्बत का किनारा हो जा

हुस्न-ए-बुताँ का इ’श्क़ मेरी जान हो गया

ये कुफ़्र अब तो हासिल-ए-ईमान हो गया

उस का ईमान लूटते हैं सनम

जिस को अपना शिकार करते हैं

दीवानों पे किस दर्जा तिरा लुत्फ़-ओ-करम है

बख़्शा है जो ग़म तू ने वही हासिल-ए-ग़म है

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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