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अज्ञात के दोहे
मन मौती और दूध रस इन के यही सुभाव
फाटे से फिर ना मिलैं कोटन करौ उपाव
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कबीर संगत साधु की ज्यों गंधी का बास
जो कुछ गंधी दे नहीं तौ भी बास सुबास
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तुलसी जो तुम कहत ते संगत ही गुन होय
माँझ ओखारी रमसरा रस काहै नहिं होय
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परदेसी की प्रीत को सब को मन ललचाय
अवगुण वामें एक है रहे न संग ले जाय
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अमी प्यावै मान-बिन रहिमन मुई न सुहाय
मान सहित मरबो भलो बर-बिष दै बुलाय
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चम्पा तो में तीन गुण रंग-रूप और बास
अवगुण तो में कौन है भँवर न बैठै पास
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सौना कहै सुनार से कि उत्तम मेरी ज़ात
कारे मुँह की घुंघची तुलै हमारे साथ
लालन के हम लाल हैं और लाल ही हमरो रंग
करया मुँह जब से भयो तुलै नीच के संग
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कागा सब तन खाइयो चुन-चुन खाइयो मास
दो नैना मत खाइयो कि पिया मिलन की आस
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फूलहिं फरहिं न बेत
यध्पि सुधा बरसहिं जलिध
मूरख हृदय न चेत
जौ गुरु मिलहिं बिरंचश्य
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साँचे कोई न पतीजिए झूटे जग पतियाय
गली-गली गोरस फिरै मदिरा बैठ बिकाय
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फ़र्ज़ी शाह न हो सके गत ठटरी तासीर
रहिमन सीधी चाल से प्यादा होत वज़ीर
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नैन सलौने अधर मधु कहु रहीम घट कौन
मीठो चहिय लौन पै मीठे हू पै लौन
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पीतम तुम परदेस सिधारे ले गए मोरा चैन
तुमरे कारन राम दोहाई तड़पत हूँ दिन रैन
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आगे के दिन पाछे गए हरी से क्या न हेत
अब पछतावे होत क्या जब चिड़िया चुक गईं खेत
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आज चन्द्रमाँ दौज है जग चितवत चहुँ ओर
हमरे और वा मित्र के नैन भय इक ठोर
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सबै सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय
पवन जगावत आग को दीप ही देत बुझाय
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नदी किनारे धुआँ उठत है मैं जानों कुछ होय
जा कारन जोगिन भई वही न जलता होय
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पीत किए धन धर्म गयो उर बिगड़े सिगरे काम
अपने थे सो बैर भय और नाम हुआ बदनाम
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मीर में मीर अमीर वही जो अमीर हुए पे ग़ुरूर करै ना
पीर में पीर फ़क़ीर वही जो फ़क़ीर हुवे पै सवाल करै ना
ता'रीफ़ उसी तरवार की है जो धार पै अपने झुरै ना मुरै ना
मर्द में मर्द वही है भलो जो कहै सो करै जो करै सो कहै ना
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तुलसी अपने राम को रीझ भजौ के खीज
उल्टे-सीधे जाम हैं खेत परे के बीज
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जब दाँत न थे तब दूध दियो अब दाँत दिए का अन्न न दै है
जल में थल में पंछी पशु की सुध लेत सो तेरी हो ली है
काहै कों सोंंच करै मन मूरख सोंंच-बिचार करैं कछू हाथ न ऐ है
जान को देत अजान को देत जहाँ को देत सो तऊ को दै है
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बिरहा जलती देख के साईं आए धाय
प्रेम बूँद से सींच के तन से लियौ लगाय
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कर काँपत पतियाँ लिखत जल भर आवत नैन
कोरो कागज हाथ दै मुख ही कहयो बीन
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प्रीतम तुम जिन जानियो तुम बिछुरैं मुइ चैन
आले बन की लाकरी सुलगत हूँ दिन-रैन
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हद हद कर के सब गए बे-हद गया न कोय
अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय
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सीख वाही को दीजे जा कों सीख सोहाय
सीख न दीजे बांदारा घर बनिए का जाये
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नेह सगा सोई सगा हाड़ सगा नहीं होय
माँ बैठी त्रिया जरे अचरज जग कों होय
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दर-दीवार दर्पण भए जित देखूँ तित तूए
काँकर-पाथर ठीकरी भए आरसी मोए
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सात स्वर्ग अपवर्ग-सुख धरै तुला इक अंग
तुलै न ताहि सकल मिले जो सुख लो सतसंग
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तुलसी आह गरीब की कभू न खाई जाए
मरे चाम की साँस से सार भसम होह जाए
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तन उजरो मन कोएला बगुले का सा भेस
तो सें तो कागा भल्लू बाहर भीतर एक
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साजन तोरे दरशन को तरसत हूँ दिन-रैन
तारे गिनती रहत हूँ पलक लगे ना नैन
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नानक नन्हा हो रहौ जैसी नन्ही दूब
सबै घास चर जाएँगी दूब ख़ूब की ख़ूब
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सीस कान मुख नासिका ऊँचे ऊँचे नाव
'सहजो' नीचे कारने सब कोइ पूजें पाँव
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आग लगी है बृक्ष को जलने लागे पात
तू क्यूँ जरे है पंखिया पँख हैं तेरे साथ
फल खाए उस बृक्ष के गंदे कंहे पात
अब है मेरा धर्म ये जर जाऊँ ईहे साथ
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जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किए दुख होय
नगर ढंडोरा पीटती कि प्रीत न करियो कोय
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चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में साबुत बचाना कोय
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तुलसी आह गरीब की कभू न खाली जाए
मरे चाम की साँस से सार भसम हो जाए
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राम-राम सब कोई कहै ठग ठाकुर और चोर
बिना प्रेम रीझे नहीं तुलसी नँनद किशोर
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कथनी मीठी खांड सी करनी बस की लोय
कथनी तज करनी करौ तो बिष सें अमृत होय
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जा घट प्रेम न संचरै सो घट जान मसान
जैसे खाल लोहार की साँस लेत बिन प्रान
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रहे समीप बड़यन के होत बड़ो हित मेल
सब ही जानत बढ़त है बृक्ष बराबर बेल
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छुटी न ससुता की झलक झलकियो जोबन अंग
द्वैत देह दो हुन मिले देत ताफ़ता रंग
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बाँह छुड़ाए जात हो सुनिबल जान के मोय
हृदय में से जाओगे तो मर्द बंदूगी तोय
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कबीर बैरी सबल हैं एक जीव रिपु पाँच
अपने अपने स्वाद कों सभी नचावें नाच
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जल सूखे पंछी उड़ै औरे सरन समाएँ
दीन मीन बिन पच्छ की कहो रहीम कहँ जाएँ
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere