Font by Mehr Nastaliq Web
Sufinama
Muzaffar Warsi's Photo'

मुज़फ़्फ़र वारसी

1933 - 2011 | लाहौर, पाकिस्तान

मा’रूफ़ मुसन्निफ़, अदीब, फ़िल्म-गीतकार और शाइ’र

मा’रूफ़ मुसन्निफ़, अदीब, फ़िल्म-गीतकार और शाइ’र

मुज़फ़्फ़र वारसी के अशआर

श्रेणीबद्ध करें

दफ़्न हूँ एहसास की सदियों पुरानी क़ब्र में

ज़िंदगी इक ज़ख़्म है और ज़ख़्म भी ताज़ा नहीं

अपने रिसते हुए ज़ख़्मों पे छिड़क लेता हूँ

राख झड़ती है जो एहसास के अँगारों से

साया कोई मैं अपने ही पैकर से निकालूँ

तन्हाई बता कैसे तुझे घर से निकालूँ

कर्बला सामने आती जो वो लाशे ले कर

आँख तो आँख है पत्थर से भी रिसता पानी

मजबूर-ए-सुख़न करता है क्यूँ मुझ को ज़माना

लहजा मिरे जज़्बात का इज़हार कर दे

यूँ हुई रूह को महसूस मोहब्बत उस की

जैसे आग़ोश में दरिया के समुंदर उतरा

इ'ल्म वालों को शहादत का सबक़ तू ने दिया

मर के भी ज़िन्दा रहे इंसाँ ये हक़ तू ने दिया

जुग़राफ़िए ने काट दिए रास्ते मिरे

तारीख़ को गिलः है कि मैं घर नहीं गया

वो सितारा जो मिरे नाम से मंसूब हुआ

दीदः-ए-शब में है इक आख़िरी आँसू की तरह

मैं जलाता रहा तेरे लिए लम्हों के चराग़

तू गुज़रता हुआ सदियों की सवारी में मिला

सुनाई जाएगी जब तक मुझे सज़ा-ए-सुख़न

सुकूत-ए-वक़्त में आवाज़ भर चुका हूँगा

लगा के ज़ख़्म बहाने चला है अब आँसू

रुका है ख़ून कहीं पट्टियाँ भिगोने से

औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी

और अपने गरेबान में झाँका नहीं जाता

रात गए यूँ दिल को जाने सर्द हवाएँ आती हैं

इक दरवेश की क़ब्र पे जैसे रक़्क़ासाएँ आती हैं

पड़ गया पर्दा समाअ'त पर तिरी आवाज़ का

एक आहट कितने हँगामों पे हावी हो गई

भाग निकला था जो तूफ़ाँ से छुड़ा कर दामन

सर-ए-साहिल वही डूबा हुआ कश्ती में मिला

मैं इक आँसू ही सही हूँ बहुत अनमोल मगर

यूँ पलकों से गिरा कर मुझे मिट्टी में मिला

आँख रौशन हो तो दुनिया के अँधेरे क्या हैं

रस्तः महताब को रातों की सियाही में मिला

बड़े ख़ुलूस से माँगी थी रौशनी की दुआ

बढ़ा कुछ और अँधेरा चराग़ जलने से

डूब कर देख समुंदर हूँ मैं आवाज़ों का

तालिब-ए-हुस्न-ए-समाअत मिरा सन्नाटा है

ये फ़ैसला तो बहुत ग़ैर-मुंसिफ़ाना लगा

हमारा सच भी अदालत को बाग़ियाना लगा

उस वक़्त तक सुलगती रही उस की आरज़ू

जब तक धुएँ से सारा बदन भर नहीं गया

बड़े ख़ुलूस से माँगी थी रौशनी की दुआ

बढ़ा कुछ और अँधेरा चराग़ जलने से

लगाई आग भी इस एहतिमाम से उस ने

हमारा जलता हुआ घर निगार-ख़ाना लगा

जिस की गर्दन में है फंदा वही इंसान बड़ा

सूलियों से यहाँ पैमाइश-ए-क़द होती है

पड़ गया पर्दा समाअ'त पर तिरी आवाज़ का

एक आहट कितने हंगामों पे हावी हो गई

अश्कों से कहीं मिटता है एहसास-ए-तलव्वुन

पानी में जो घुल जाए वो पारा नहीं होता

मुंतज़िर रहना भी क्या चाहत का ख़म्याज़ नहीं

कान दस्तक पर लगे हैं घर का दरवाज़ा नहीं

दूर जा कर मिरी आवाज़ सुनी दुनिया ने

फ़न उजागर मिरा आईना-ए-फ़र्दा से हुआ

मेरी हर सोच के रस्ते में खड़ा है कोई

आईना-ख़ाने में तन्हाई कहाँ से आए

साहिल की आरज़ू नहीं ता'लीम-ए-मुस्तफ़ा

ये नाव तो रोज़ानः ही मंजधार से हुई

पत्थर मुझे शर्मिंदा-ए-गुफ़तार कर दे

ऊँचा मिरी आवाज़ को दीवार कर दे

इस भरे शहर में करता हूँ हवा से बातें

पाँव पड़ता है ज़मीं पर मिरा आहू की तरह

ढूँडने निकला था आवाज़ों की बस्ती में उसे

सोच कर वीराँ गुज़रगाहों पे बैठा रह गया

काहकशाँ के ख़्वाब 'मुज़फ़्फ़र' देख रहा था

और बेदारी रेत के टीले पर ले आई

ये रात क्यूँ हो अफ़ज़ल तमाम रातों में

लिए हुए हैं अंधेरे चराग़ हाथों में

छटेगी कैसे 'मुज़फ़्फ़र' सियाही क़िस्मत की

निकल तो आएगा ख़ुर्शीद रात ढलने से

दफ़्न हूँ एहसास की सदियों पुरानी क़ब्र में

ज़िंदगी इक ज़ख़्म है और ज़ख़्म भी ताज़ा नहीं

हम ने ये तहज़ीब परिंदों से सीखी है

सुब्ह को घर से जाना शाम को घर जाना

रंग सी शक्ल मिली है तुझे ख़ुश्बू सा मिज़ाज

लाला-ओ-गुल कहीं तेरा ही सरापा तो नहीं

दश्त-नवर्दी के दौरान 'मुज़फ़्फ़र' सर पर धूप रही

जब से कश्ती में बैठे हैं रोज़ घटाएँ आती हैं

मेरी आवाज़ ख़मोशी ने मुझे लौटा दी

मुझ में अब जुरअत-ए-गोयाई कहाँ से आए

मैं अपने घर में हूँ घर से गए हुओं की तरह

मिरे ही सामने होता है तज़्किरः मेरा

या-रहमतल-लिलआलमीन

आईनः-ए-रहमत बदन साँसें चराग़-ए-इ’ल्म-ओ-फ़न

साँसों की ओट ले के चला हूँ चराग़-ए-दिल

सीने में जो नहीं वो घुटन रास्ते में है

वो लहर हूँ जो प्यास बुझाए ज़मीन की

चमके जो आसमाँ पे वो पत्थर नहीं हूँ मैं

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

Recitation

बोलिए