रियाज़ ख़ैराबादी के अशआर
हमें ख़ुदा के सिवा कुछ नज़र नहीं आता
निकल गए हैं बहुत दूर जुस्तुजू करते
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हैं सदक़े किसे आज प्यार आ गया
ये कौन आ गया मेरे आग़ोश में
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टैग : आग़ोश
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वो बोले तिरी आह-ए- सोज़ाँ 'रियाज़'
हमेशा तिरा मुँह झुलसती रही
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बहुत ही ख़ैर गुज़री होते होते रह गई उस से
जिसे में ग़ैर समझा हूँ वो उन का पासबाँ होगा
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टैग : ग़ैर
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कमर सीधी करने ज़रा मय-कदे में
अ'सा टेकते क्या 'रियाज़' आ हे हैं
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टैग : कमर
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कलीम बात बढ़ाते न गुफ़्तुगू करते
लब-ए-ख़ामोश से इज़हार-ए-आरज़ू करते
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टैग : इज़हार
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हरम है जा-ए-अदब काम देगी जन्नत में
फ़रिश्तो ताक़ से बोतल ज़रा उठा देना
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टैग : जन्नत
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वो कुछ ग़ैर से वा'दा फ़रमा रहे हैं
मरे सर की झूटी क़सम खा रहे हैं
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टैग : ग़ैर
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उड़ती थी वो शय आती थीं जन्नत की हवाएँ
अब रिंदों का जमघट सर-ए-ज़मज़म नहीं होता
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हसीन भी हूँ ख़ुश-आवाज़ भी फ़रिश्ता-ए-क़ब्र
कटी है उम्र हसीनों से गुफ़्तुगू करते
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समाए हैं अपने निगाहों में ऐसे
जब आईना देखा है हैराँ हुए हैं
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ख़ुदा जाने कहता हूँ मस्ती में क्या
ख़ुदा जाने बकता हूँ क्या जोश में
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हमें है घर से तअ'ल्लुक़ अब इस क़दर बाक़ी
कभी जो आए तो दो-दिन को मेहमाँ की तरह
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टैग : घर
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वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता
किस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता
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टैग : ख़ुशी
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सुना है हम ने बहुत कुछ कलीम के मुँह से
हम आएँ तो हमें आवाज़ ही सुना देना
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टैग : आवाज़
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शाद के नाम से हर रंज-ओ-ख़ुशी हो के 'रियाज़'
सद्र-ए-आ'ज़म को शब-ओ-रोज़ दुआ' देता है
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टैग : ख़ुशी
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'रियाज़' ईमा है उन का हम-नवा हों मुर्ग़-ए-गुलशन में
हुई है मुनअ'क़िद बज़्म-ए-सुख़न सेहन-ए-गुलिस्ताँ में
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टैग : गुलशन
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क्या सुर्मा भरी आँखों से आँसू नहीं गिरते
क्या मेहंदी लगे हाथों से मातम नहीं होता
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टैग : आँसू
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न लाला-ज़ार बनाना मज़ार को न सही
चराग़ के आगे कभी शाम को जला देना
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टैग : चराग़
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मोती सी वो आब कहाँ आँसू काला मोती है
शायद मेरी हिज्र की शब मुँह की स्याही होती है
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ख़याल-ए-शब-ए-ग़म से घबरा रहे हैं
हमें दिन को तारे नज़र आ रहे हैं
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टैग : ग़म
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अ'नादिल भी कलियाँ भी गुल भी सबा भी
ये सोहबत है हँसने हँसाने के क़ाबिल
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टैग : गुल
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ऐ क़यामत आ भी तेरा हो रहा है इंतिज़ार
उन के दर पर लाश इक रखी है कफ़्नाई हुई
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क़ब्र में है आज ओ पर्दा-नशीं
ले तिरे रुस्वा ने भी पर्दा किया
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'रियाज़' मौत है इस शर्त से हमें मंज़ूर
ज़मीं सताए न मरने पे आसमाँ की तरह
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वो ख़ुदाई के लुटाए जो ख़ज़ाने कम है
मीर उ'स्मान-ए-अ'ली ख़ान को ख़ुदा देता है
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टैग : ख़ुदा
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'रियाज़' अपनी क़िस्मत को अब क्या कहूँ में
बिगड़ना तो आया सँवरना न आया
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टैग : क़िस्मत
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ख़ुदा अपने बंदों की सुनता अगर
तू सुनते बुतों की ख़ुदाई हुई
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टैग : ख़ुदा
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निकल कर तेरे कूचे से गुज़र मेरा जहाँ होगा
हज़ारों आसमाँ होंगे वहाँ एक आसमाँ होगा
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न था शबाब कमर में 'रियाज़' ज़र होता
तो दिन बुढ़ापे के भी नज़्र-ए-लखनऊ करते
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आस्तीं रंग बदले आई लहू दे निकली
न छुपा लाख छुपा हश्र में क़ातिल मेरा
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ख़ुदा जाने दिखाए गी ये क्या रँग
दुआ'एँ जम्अ' हैं अ'र्श-ए-बरीं पर
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का'बे में ख़याल-ए-रुख़-ए-नैकू-ए-अ'ली है
अल्लाह के घर में नज़र सू-ए-अ'ली है
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ये क़िस्मत दाग़ जिस में दर्द जिस में
वो दिल हो लूट दस्त-ए-नाज़नीं पर
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साहिल तह से दूर सिवा तह साहिल से दूर सिवा
क़िस्मत क़ा'र-ए-समुंदर में कश्ती आज डुबोती है
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गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक-गरेबानों के
शक्ल मा'शूक़ की अंदाज़ हैं दीवानों के
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में बला-नोश हूँ पी जाऊँ जो दरिया पाऊँ
मुझे घर बैठे मय-ए-होश-रुबा देता है
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टैग : घर
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बिकी मय बहुत फ़स्ल-ए-गुल में गराँ
जो सच पूछो फिर भी ये सस्ती रही
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टैग : गुल
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रंग पर कल था अभी लालः-ए-गुलशन कैसा
बे-चराग़ आज है हर एक नशेमन कैसा
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टैग : गुलशन
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न आया हमें इ'श्क़ करना न आया
मरे उ'म्र भर और मरना न आया
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वो ख़ुदाई के लुटाए जो ख़ज़ाने कम है
मीर उ'स्मान-ए-अ'ली ख़ान को ख़ुदा देता है
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ये काहे को आती मिरी क़ब्र में
क़यामत है उन की सताई हुई
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बने पंखुड़ी नक़्श-ए-पा कब लहद पर
तुझे ऐ सबा गुल कतरना न आया
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बला है क़ब्र की शब इस से बढ़ के हश्र के दिन
न आऊँ होश में इतनी मुझे पिला देना
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अरे ओ चर्ख़ देने के लिए दाग़
बहुत हैं चाँद के टुकड़े ज़मीं पर
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तो धरी जाएगी उस घर से जो निकली कोई बात
निगह-ए-शौक़ ये दीवार में रौज़न कैसा
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टैग : घर
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हमें तो जीते जी कौसर को पिलवा
ख़ुदा-या छोड़ दी है तेरे डर से
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टैग : ख़ुदा
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दूर से ऐ निगह-ए-शौक़ बलाएँ ले ले
किस अदा से है नक़ाब-ए-रुख़-ए-ज़ेबा सेहरा
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ये आ’लम है ‘रियाज़’ एक एक क़तरा को तरसता हूँ
हरम में अब ख़ुदा जाने भरी बोतल कहाँ रख दी
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उभारे से उभरे न गुल तेरे आगे
चहकने को चहके अ'ना दिल हज़ारों
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टैग : गुल
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere