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मीर मोहम्मद बेदार

1732 - 1793 | दिल्ली, भारत

ख़्वाजा फ़ख़्रुद्दीन चिश्ती देहलवी के मुरीद और गुम-गश्ता सूफ़ी शाइ’र

ख़्वाजा फ़ख़्रुद्दीन चिश्ती देहलवी के मुरीद और गुम-गश्ता सूफ़ी शाइ’र

मीर मोहम्मद बेदार के अशआर

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रात थोड़ी सी है बस जाने दे मिल हँस कर बोल

ना-ख़ुशी ता-ब-कुजा सुब्ह हुई जाती है

आह जिस दिन से आँख तुझ से लगी

दिल पे हर रोज़ इक नया ग़म है

ख़ुशी है सब को रोज़-ए-ई’द की याँ

हुए हैं मिल के बाहम आश्ना ख़ुश

गर कहीं उस को जल्वा-गर देखा

गया हम से आँख भर देखा

कौन है किस से करूँ दर्द-ए-दिल अपना इज़हार

चाहता हूँ कि सुनो तुम तो कहाँ सुनते हो

आह मिलते ही फिर जुदाई की

वाह क्या ख़ूब आश्नाई की

आज क्या है कहो क्यूँ ऐसे ख़फ़ा बैठे हो

अपनी कहते हो मेरी ही मियाँ सुनते हो

गर किसी ग़ैर को फ़रमाओगे तब जानोगे

वे हमीं हैं कि बजा लावें जो इरशाद करो

‘बेदार’ करूँ किस को में इज़हार-ए-मोहब्बत

बस दिल है मिरा महरम-ए-असरार-ए-मोहब्बत

बद-मिज़ाजी ना-ख़ुशी आज़ुर्दगी किस वास्ते

गर बुरे हम हैं तो हो जिए और से जा आश्ना

गर बड़े मर्द हो तो ग़ैर को याँ जा दीजे

उस को कह देखिए कुछ या मुझे उठवा दीजे

आह क़ासिद तू अब तलक फिरा

दिल धड़कता है क्या हुआ होगा

आह यार क्या करूँ तुझ बिन

नाला-ए-ज़ार क्या करूँ तुझ बिन

जगा कर ख़्वाब-ए-आसाइश से 'बेदार' आह हस्ती में

अ'दम-आसूदगाँ को ला के डाला है तबाही में

जगा कर ख़्वाब-ए-आसाइश से 'बेदार' आह हस्ती में

अ’दम-आसूदगाँ को ला के डाला है तबाही में

इ’श्क़ का दर्द-ए-बे-दवा है ये

जाने तेरी बला कि क्या है ये

मुद्दतों से आरज़ू ये दिल में है

एक दिन तू घर हमारे आइए

एक दिन मुद्दतों में आए हो

आह तिस पर भी मुँह छुपाए हो

आह मिलते ही फिर जुदाई की

वाह क्या ख़ूब आश्नाई की

हिना की तरह अगर दस्तरस मुझे होती

तो किस ख़ुशी से तिरे पाँव में लगा करता

यूँ मुझ पे जफ़ा हज़ार कीजो

पर ग़ैर को तो प्यार कीजो

तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते हो

ये तो कहने ही की बातें हैं कहाँ सुनते हो

जाता है मिरे घर से दिल-दार ख़ुदा-हाफ़िज़

है ज़िंदगी अब मुश्किल बे-यार ख़ुदा-हाफ़िज़

उठ जाऊँगा एक दिन ख़फ़ा हो

यहाँ तक करो उदास मुझ को

सर-ओ-बर्ग-ए-ख़ुशी गुल-बदन तुझ बिन कहाँ मुझ को

गुलिस्तान-ए-दिल आया फ़ौज-ए-ग़म की पाएमाली में

अंजुमन-साज़-ए-ऐ’श तू है यहाँ

और फिर किस की आरज़ू है यहाँ

एक दिन तुझ को दिखाऊँगा मैं इन ख़ूबाँ को

दावा-ए-यूसुफ़ी करते तो हैं इज़हार बहुत

एक आ’लम अभी हैरत-ज़दा कर आया तू

फिर अब आईना-रुख़्सार कहाँ जाता है

कहता है नाला आह से देखें तो कौन जल्द

उस शोख़ संग-दिल में करे तू है घर कि हम

पाते नहीं आप को कहीं याँ

हैरान हैं किस के घर गए हम

जाइयो यार घर से जल्दी

मत कुश्ता-ए-इंतिज़ार कीजो

मेहर-ए-ख़ूबाँ ख़ाना-अफ़रोज़-ए-दिल-अफ़सुर्दः है

शो'ला आब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-चराग़-ए-मुर्दः है

गुल ही तन्हा ख़जिल है रुख़-ए-रनगीं से तिरे

नर्गिस आँखों के तिरे सामने शरमाती है

जुज़ तेरे नहीं ग़ैर को रह दिल के नगर में

जब से कि तिरे इश्क़ का याँ नज़्म-ओ-नसक़ है

यूँ मुझ पे जफ़ा हज़ार कीजो

पर ग़ैर को तो प्यार कीजो

साफ़ या दुर्द-ए-बादा-ए-गुल-गूँ

साक़ी-ए-लाला-फ़ाम कुछ भी है

ग़ैर-ए-हर्फ़-ए-नियाज़ सो भी कभू

कह सकूँ हूँ मजाल है कुछ और

बद-मिज़ाजी ना-ख़ुशी आज़ुर्दगी किस वास्ते

गर बुरे हम हैं तो हो जिए और से जा आश्ना

देख चमन-ए-हुस्न तुझे बाग़ में ख़ंदाँ

शबनम नहीं ये गुल पे ख़जालत से अरक़ है

ये तवक़्क़ो थी हमें हरगिज़

कि दिखाओगे ये जफ़ा दिल को

ख़्वाब 'बेदार' मुसाफ़िर के नहीं हक़ में ख़ूब

कुछ भी है तुझ को ख़बर हम-सफ़राँ जाते हैं

आ'शिक़-ए-जाँ-निसार को ख़ौफ़ नहीं है मर्ग का

तेरी तरफ़ से सनम जौर-ओ-जफ़ा जो हो सो हो

नींद आवेगी तन्हा 'बेदार'

ता ख़्वाब उस से बहम कीजिएगा

मगर आँसू किसू के पोंछे हैं

आस्तीं आज क्यूँ तिरी नम है

देख तेरे मुँह को कुछ आईना ही हैराँ नहीं

तुझ रुख़-ए-रौशन की है महर-ओ-मह-ए-ताबाँ में धूम

गर इजाज़त हो तो परवाना की तरह

सदक़ा होने को तुम्हारे आइए

यहाँ से 'बेदार' गया वो मह-ए-ताबाँ शायद

नज़र आता है ये घर आज तो बे-नूर हमें

जल्वा दिखा के गुज़रा वो नूर दीदगाँ का

तारीक कर गया घर हसरत-ए-कशीदगाँ का

आह-ए-सोज़ाँ अश्क-ए-गुल-गूँ से

कार-ए-बर्क़-ओ-सहाब करता हूँ

दूर हो गर शाम्मा से तेरे ग़फ़लत का ज़ुकाम

तू उसी की बू को पावे हर गुल-ओ-सौसन के बीच

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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