Sufinama

दोहे

प्रसिद्ध सूफ़ी और संत कवि कबीर, रहीम, बिहारी, शाह बरकतुल्लाह पेमी और अन्य कवियों के प्रसिद्ध लोकप्रिय दोहे पढ़िए.

मैय्युज़-लील्हो जु हर भयो पाप की मोट

फला-हादीया-लहु होय नहिं करो जतन किन कोट

बरकतुल्लाह पेमी

सत जो जाए तो रहै क्या नीती गए सब जाए

लजिया बिना निलज्ज है बिन बिद्या अघाय

बरकतुल्लाह पेमी

मैंय्यहदिल्लाहो कों फ़ला-मुज़िल्ला-लहु कोय

निहचयँ के मन जानियो और दूजा कोय

बरकतुल्लाह पेमी

नई रीति या पीत की पहलें सब सुख देह

पाछैं दुख की जील में डार करै तन खेह

बरकतुल्लाह पेमी

पाँचौ पाँचौ पाँचियो नबी चार हू नांह

बाचोगे दुख पाप तें नाँचो बैकुंठ माँह

बरकतुल्लाह पेमी

बे-हद की हद मीम सों भई 'पेम' मद होय

बिला मीम अहमद कहै काकी हद होय

बरकतुल्लाह पेमी

गत तिहारी अधिक है मो मत सके गाए

ज्यों कतान सम चंद के टूक-टूक हो जाए

बरकतुल्लाह पेमी

लिखें सबई लीखें नहीं मोहन प्रान सहाय

अलख लखै कउ लाख मूँ लिखा लखा तो काय

बरकतुल्लाह पेमी

अबि-बकर और उमर पुन उस्मान अ'ली बखान

सत नेति और लाज अती बिद्या बूझ सुजान

बरकतुल्लाह पेमी

मूरख लोग बूझि हैं धरम-करम की छीन

एक तो चाहैं अधिक कै इक तो देखें हीन

बरकतुल्लाह पेमी

मन जोगी तन कि मढ़ी सेत गूदरि ध्यान

नैनाँ जल बिरह धोएँ बिच्छा दरसन जान

बरकतुल्लाह पेमी

तू मैं मैं तू एक हैं और दूजा कोय

मैं तो कहना जब छुटे वही वही सब होय

बरकतुल्लाह पेमी

मन भटको चहुँ ओर तें आयो सरन तिहार

करुना कर के नाँव की करिए लाज मुरार

बरकतुल्लाह पेमी

बीज बिरछ नहिं दोय हैं रूई चीर नहीं दोय

दध तरंग नहीं दोय हैं बूझो ज्ञानी लोय

बरकतुल्लाह पेमी

औरंगजेब के राज में भई ग्रंथ की आस

'पेमी' नाँव बिचार के धरा पेम-प्रकाश

बरकतुल्लाह पेमी

'पेमी' तन के नगर में जो मन पहरा देय

सोवे सदा अनंद सों चोर माया होय

बरकतुल्लाह पेमी

'पेमी' हिन्दू तुरक मों हर-रंग रहो समाय

देवल और मसीत मों दीप एक हीं भाय

बरकतुल्लाह पेमी

तुम जानी कछु 'पेम' मग बातन बातन जाय

पंथ मीत को कठिन है खेलो फाग बनाय

बरकतुल्लाह पेमी

दधि-मन देत तरंग नित रंग रंग बिस्तार

कोउ तरंग मोती सहित काहु संग सेवार

बरकतुल्लाह पेमी

अलख लखे जब आप कों लखे राखे मोह

लिखें पढ़ें कछु होत नहिं कहे तो लिख देवँ तोह

बरकतुल्लाह पेमी

योमिनूना बिल-ग़ैब कूँ आँख मूँद मन पील

सीखो गुरु सों ये जुगत आँख-मिचौनी खेल

बरकतुल्लाह पेमी

तन निर्मल कर बूझिए मन की अधिकै सीख

वहोवा मअ'कुम के भेद सों फिर फिर आपै देख

बरकतुल्लाह पेमी

तालकल्ल दोउ कहै ब्योरा बूझो कोय

इक बक़ा एक फ़ना है 'पेम' पुराने लोय

बरकतुल्लाह पेमी

हम बासी वा देस के जहाँ पाप पुन्न

बिदिसा दिसा होत है 'पेमी' सनै सुन्न

बरकतुल्लाह पेमी

तोहिं तोहिं तब कहै हौंहीं हौंहीं जाय

जल गंगा में मिल गयो सिर की गई बलाय

बरकतुल्लाह पेमी

हम तुम स्वामी एक है कहन सुनन को दोय

मन को मन से तोलिए दो मन कभी होय

आसी गाज़ीपुरी

मै चाहूँ कि उड़ चलूँ पर बिन उड़ा जाय

काह कहौं करतार को जो पर ना दिया लगाय

आसी गाज़ीपुरी

ओस ओस सब कोई कहे आँसू कहै कोय

मोहि विरहिन के सोग मे रैन रही है रोय

आसी गाज़ीपुरी

भुज फरकत तोरे मिलन को स्रवन सुनन को बैन

मन माला तोहि नाम का जपत रहत दिन रैन

आसी गाज़ीपुरी

कर कम्पे लिखनी डिगे अंग अंग थहराय

सुधि आवत छाती फटे पांती लिखी जाय

आसी गाज़ीपुरी

साबधान होय चुप रहे, चितयौ है चहुँ और।।

वाट वीचि ही ले गए, बसत साह की चोर।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

पंचकै तन काहू रच्यो, बच्यो अगन मंझार।।

जब इनमें कहू कौन था, जो अब कहै हमार।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

अब कहूँ गोद कहूँ पालनै, कहूँ हासौ कहूँ रोज।।

गिरयो पडयो घुटने चल्यो, नहीं ग्यांन को खोज।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

साध वेद सब टेरि हैं, सुनैन विषिया प्रांन।।

पिंड पाप कै वस पडै, कहि कहि हारे ग्यांन।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

काहू पूरब पुन्य करि, तैं पाई नर देह।।

कै महरवान हो मौजदी, जन्म सुफल कर लेह।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

दस महीनां गर्भवास में, तहां रह्यौ मुख मूंदि।।

जहां तात मात की गम नहीं, वहां राखनहारा कौन।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

नख चख सौंज बनाय करि, प्रभु आन्यो मुक्ती ठौर।।

निपजी में साझी घणा, धनी भए तब ओर।।

महात्मा षेमदासजी (निरंजनी)

रंग वही यकरंग रंगो, कि सबसे रंगा जाय।

'यकरंग' तुम वह रंग रंगो, कि हर रंग में मिल जाय।।

यकरंग

संपत तो हम के कटें, विपत कटें ना रोय।

'यकरंग' आसा राखिये, हरि चाहे सो होय।।

यकरंग

हरिजन हरि के पंथ जिय ऐसें देत मिलोय

निधरक लोभै छाड़ के जम-सुध ही ना होय

बरकतुल्लाह पेमी

पार कहैं तै वार हैं वार कहैं नहीं पार

या मग आर-न-पार है तन-मन डारो वार

बरकतुल्लाह पेमी

जो कछु करै तो मन दुखी मेटैं गुरु मुख रीत

भेद वचन समझै नहीं चलै चाल विपरीत

सहजो बाई

साध कहावै आप में चलै दुष्ट की चाल

बाद लिये फूला फिरै बहुत बजावै गाल

सहजो बाई

परमहंस तारन तरन गुरु देवन गुरु देव

अनुभै वाणी दीजिये सहजो पावै भेव

सहजो बाई

गुरु मग दृढ़ पग राखिये डिग मिग डिग मिग छाँड

'सहजो' टेक टरै नहीं सूर सती जो माँड

सहजो बाई

निर्मल आनँद देत हौ ब्रह्म रूप करि देत

जीव रूप की आपदा व्याधा सब हरि लेत

सहजो बाई

ज्ञान भक्ति अरु जोग का घट लेवै पहँचान

जैसी जाकी बुद्धि है सोइ बतावै ध्यान

सहजो बाई

हरि करिपा जो होय तो नाहिं होय तो नाहिं

पै गुरु किरपा दया बिनु सकल बुद्धि बहि जाहिं

सहजो बाई

सद्गुरुमहिमा - चरनदास समरथ गुरु सर्व अंग तिहिमाहिं

जैसे को तैसा मिलै रीता छाँड़ै नाहिं

सहजो बाई

सद्गुरुमहिमा - कर जोरूं प्रणाम कारि धरूँ चरन पर सीस

दादा गुरु सुखदेव जी पूरण विश्वा बीस

सहजो बाई