Sufinama

दोहे

विषम पदों में 13 और सम पदों में 11 मात्रा, आदि में जगण नहीं रखना चाहिए और अंत में लघु होता है।,मात्रिक छन्द

तुम जानी कछु 'पेम' मग बातन बातन जाय

पंथ मीत को कठिन है खेलो फाग बनाय

बरकतुल्लाह पेमी

मैंय्यहदिल्लाहो कों फ़ला-मुज़िल्ला-लहु कोय

निहचयँ के मन जानियो और दूजा कोय

बरकतुल्लाह पेमी

सत जो जाए तो रहै क्या नीती गए सब जाए

लजिया बिना निलज्ज है बिन बिद्या अघाय

बरकतुल्लाह पेमी

लिखें सबई लीखें नहीं मोहन प्रान सहाय

अलख लखै कउ लाख मूँ लिखा लखा तो काय

बरकतुल्लाह पेमी

पाँचौ पाँचौ पाँचियो नबी चार हू नांह

बाचोगे दुख पाप तें नाँचो बैकुंठ माँह

बरकतुल्लाह पेमी

नई रीति या पीत की पहलें सब सुख देह

पाछैं दुख की जील में डार करै तन खेह

बरकतुल्लाह पेमी

बे-हद की हद मीम सों भई 'पेम' मद होय

बिला मीम अहमद कहै काकी हद होय

बरकतुल्लाह पेमी

गत तिहारी अधिक है मो मत सके गाए

ज्यों कतान सम चंद के टूक-टूक हो जाए

बरकतुल्लाह पेमी

अबि-बकर और उमर पुन उस्मान अ'ली बखान

सत नेति और लाज अती बिद्या बूझ सुजान

बरकतुल्लाह पेमी

तू मैं मैं तू एक हैं और दूजा कोय

मैं तो कहना जब छुटे वही वही सब होय

बरकतुल्लाह पेमी

मन भटको चहुँ ओर तें आयो सरन तिहार

करुना कर के नाँव की करिए लाज मुरार

बरकतुल्लाह पेमी

बीज बिरछ नहिं दोय हैं रूई चीर नहीं दोय

दध तरंग नहीं दोय हैं बूझो ज्ञानी लोय

बरकतुल्लाह पेमी

मन जोगी तन कि मढ़ी सेत गूदरि ध्यान

नैनाँ जल बिरह धोएँ बिच्छा दरसन जान

बरकतुल्लाह पेमी

मूरख लोग बूझि हैं धरम-करम की छीन

एक तो चाहैं अधिक कै इक तो देखें हीन

बरकतुल्लाह पेमी

औरंगजेब के राज में भई ग्रंथ की आस

'पेमी' नाँव बिचार के धरा पेम-प्रकाश

बरकतुल्लाह पेमी

मैय्युज़-लील्हो जु हर भयो पाप की मोट

फला-हादीया-लहु होय नहिं करो जतन किन कोट

बरकतुल्लाह पेमी

'पेमी' तन के नगर में जो मन पहरा देय

सोवे सदा अनंद सों चोर माया होय

बरकतुल्लाह पेमी

'पेमी' हिन्दू तुरक मों हर-रंग रहो समाय

देवल और मसीत मों दीप एक हीं भाय

बरकतुल्लाह पेमी

अलख लखे जब आप कों लखे राखे मोह

लिखें पढ़ें कछु होत नहिं कहे तो लिख देवँ तोह

बरकतुल्लाह पेमी

योमिनूना बिल-ग़ैब कूँ आँख मूँद मन पील

सीखो गुरु सों ये जुगत आँख-मिचौनी खेल

बरकतुल्लाह पेमी

दधि-मन देत तरंग नित रंग रंग बिस्तार

कोउ तरंग मोती सहित काहु संग सेवार

बरकतुल्लाह पेमी

तन निर्मल कर बूझिए मन की अधिकै सीख

वहोवा मअ'कुम के भेद सों फिर फिर आपै देख

बरकतुल्लाह पेमी

तालकल्ल दोउ कहै ब्योरा बूझो कोय

इक बक़ा एक फ़ना है 'पेम' पुराने लोय

बरकतुल्लाह पेमी

हम बासी वा देस के जहाँ पाप पुन्न

बिदिसा दिसा होत है 'पेमी' सनै सुन्न

बरकतुल्लाह पेमी

तोहिं तोहिं तब कहै हौंहीं हौंहीं जाय

जल गंगा में मिल गयो सिर की गई बलाय

बरकतुल्लाह पेमी

पार कहैं तै वार हैं वार कहैं नहीं पार

या मग आर-न-पार है तन-मन डारो वार

बरकतुल्लाह पेमी

हरिजन हरि के पंथ जिय ऐसें देत मिलोय

निधरक लोभै छाड़ के जम-सुध ही ना होय

बरकतुल्लाह पेमी

मुख सुख को ससि निरमलो होत पाप तम दूर

ध्यान धरें अति पाइए 'पेमी' मन की मूर

बरकतुल्लाह पेमी

'ख़ुसरव' रैन सुहाग की जागी पी के संग

तन मेरो मन पीव को दोउ भए एक रंग

अमीर ख़ुसरौ

देख मैं अपने हाल को रोऊँ ज़ार-ओ-ज़ार

वै गुनवंता बहुत हैं हम हैं अवगुण-हार

अमीर ख़ुसरौ

पंखा हो कर मैं डुली सेती तेरा चाव

मुज जलती जनम गई तेरे लेखन भाव

अमीर ख़ुसरौ

याते जान्यो मन भयो जरि बरि भस्म बनाय

रहिमन जाहि लगाइये सो रूखो ह्वै जाय

रहीम

होत कृपा जो बडेन की सो कदाचि घटि जाय

तौ 'रहीम' मरिबो भलो ये दुख सहो जाय

रहीम

रहिमन बात अगम्य की कहन सुनन की नाहिं

जे जानत ते कहत नहि कहत ते जानत नाहिं

रहीम

माह मास लहि टेसुआ मीन परे थल और

त्यों 'रहीम' जग जानिये छुटे आपुने ठौर

रहीम

रहिमन जाके बाप को, पानी पिअत कोय

ताकी गैल अकाश लौं, क्यों कालिमा होय

रहीम

ससि सुकेस साहस सलिल मान सनेह 'रहीम'

बढ़त बढ़त बढ़ि जात हैं घटत घटत घटि सीम

रहीम

राम जाते हरिन सँग सीय रावण साथ

जो 'रहीम' भावी कतहुँ होत आपुने हाथ

रहीम

रहिमन भेषज के किए काल जीति जो जात

बड़े बड़े समरथ भए तौ कोउ मरि जात

रहीम

रहिमन बिद्या बुद्धि नहिं नहीं धरम जस दान

भू पर जनम वृथा धरै पसु बिनु पूँछ बिषान

रहीम

रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय

सुनि अठिलैंहैं लोग सब बाँटी लैहै कोय

रहीम

रहिमन जगत बड़ाइ की कूकुर की पहिचानि

प्रीति करै मुख चाटई बैर करे तन हानि

रहीम

जम जनि बौरा होई तू, कत घेरत माहि आन।

हौ तो तबहीं दे चुकी, प्रान नाथ को प्रान।।

सय्यद बरकतुल्ला

मथत मथत माखन रहै दही मही बिलगाय

'रहिमन' सोई मीत है भीर परे ठहराय

रहीम

रहिमन खोज ऊख में जहाँ रसन की खानि

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं यही प्रीति में हानि

रहीम

रहिमन तीर की चोट ते चोट परे बचि जाय

नैन बान की चोट ते चोट परे मरि जाय

रहीम

बड़े बड़ाई ना करैं बड़ो बोलैं बोल

'रहिमन' हीरा कब कहै लाख टका मो मोल

रहीम

सदा नगारा कूच का बाजत आठों जाम

'रहिमन' या जग आइ कै को करि रहा मुकाम

रहीम

'रहिमन' ओछे नरन सों बैर भलो ना प्रीति

काटे चाटै स्वान के दोऊ भाँति विपरीति

रहीम

रहिमन प्रीति सराहिए मिले होत रँग दून

ज्यों जरदी हरदी तजै तजै सफ़ेदी चून

रहीम